UGC राजनीतिक प्रोपेगैंडा, सवर्ण होशिहार!

UGC राजनीतिक प्रोपेगैंडा, सवर्ण होशिहार!

   

 सतीश कुमार दीक्षित

यूजीसी अर्थात यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के हेतु नए कानून जारी किए हैं, ऐसे कानून के लागू होने पर सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी को इसके अनुसार पीड़ित छात्र-छात्राओं की सुरक्षा का ध्यान देना होगा। यूजीसी का यह कानून मानता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से छात्रों,ं शिक्षकों या किसी कर्मचारी को जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव से बचाना है। नियमों के अनुसार किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति या जनजाति के कारण यदि उससे गलत व्यवहार किया जाता है तो उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा। फिर वह भेदभाव चाहे खुले रूप से किया गया हो या छुपे रूप से, दोनों ही परिस्थितियों में उसे गलत माना जाएगा।
सभी कॉलेज यूनिवर्सिटी में समान अवसर केंद्र (ईओसी)बनाए जाएंगे। जहॉ पीड़ितों की शिकायतों का ऑनलाइन/ऑफलाइन दर्ज करने का काम करेंगे अर्थात पीड़ितों की 24 घंटे सेवा उपलब्ध रहेगी। इस कमेटी में अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी , दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व रखे जाने की व्यवस्था है। यदि प्रकरण अपराधिक दिखाई पड़ता है तो पीड़ित को पुलिस के पास भेज दिए जाने की व्यवस्था है।
मोदी सरकार में शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी के इस कदम से सोशल मीडिया पर सवर्ण, खास तौर पर ब्राह्मण विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है यह कानून यदि लागू हो जायेगा तो समाज में कड़वाहट बढ़ जाएगी। इस विरोध के चलते लोग मोदी और शाह के पुतलो को पीट-पीट कर अपना गुस्सा दिखाते हुए नजर आए हैं। 
लोकतंत्र में सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने वीडियो पोस्ट और विरोध करने का पूरा अधिकार है जिसके चलते राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अब सड़कों पर भी दिखाई पड़ेंगे या नहीं, यह राजनीतिक दलों के नेतृत्वकर्ता ही तय करता हैं। परंतु यह तय है कि सवर्ण वोट बैंक को तीतर-बितर करने और एससी-एसटी तथा ओबीसी को वोट बैंक सवारने वाले राजनीतिक दल इस वर्तमान परिस्थिति को संभालने के लिए अपनी एड़ी चोटी से जोर लगाएंगे ताकि उनका वोट बैंक बढ़े और लोकसभा तथा विधानसभा में उनका प्रत्याशी अपनी जीत दर्ज कर सके।
अब सभी राजनीतिक दल जैसे कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा आदि का चेहरा यूजीसी के नए नियम लागू होने पर सवर्ण, एससी-एसटी तथा ओबीसी वर्ग के सामने आ चुका है। वास्तव में समाज को बांटने के लिए पहले ही आरक्षण एससी-एसटी तथा ओबीसी व अल्पसंख्यक जैसे कानून पहले ही लाये जा चुके है। यह भी सही है कि आरक्षण जैसे कानून पर विशेष जाति अर्थात एससी-एसटी तथा ओबीसी को नौकरियों में लाभ मिला और जिससे सर्वण युवाओं को काफी नुकसान हुआ और अब भी हो रहा है पूर्व में इस कानून का विरोध हुआ लेकिन कोई राजनीतिक दल सवर्ण के साथ पूरे मन से खड़ा नहीं हुआ, जिसका प्रमुख कारण यही था कि वह अपना-अपना वोट बैंक किसी भी प्रकार से खोना नहीं चाहते। वर्तमान में भी सत्ता पक्ष व विपक्ष यूजीसी के विरोध में कुछ नहीं करने वाला है। वह गौ हत्यारे के समर्थन, देश में आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों के समर्थन, एससी-एसटी की हत्या किए जाने की विरोध में तुरंत धरने प्रदर्शन पर बैठ जाने का समर्थन तो करते रहे हैं लेकिन यूजीसी के विरोध में ऐसे राजनीतिक दल कुछ भी करने वाले  नहीं हैं। इसलिए यह बात सवर्ण जातियों को अच्छी तरह से समझनी चाहिए कि वह ऐसे राजनीतिक दलों से दूर रहते हुए अपना विरोध प्रकट करने में विश्वास रखे, क्योंकि जिस देश में तिलक, तराजू और तलवार इनको जूते मारो चार, जैसे नारे सोशल मीडिया पर ख्ूब वायरल हुए। जहॉ ऐसे नारे लगे थे यह स्थान कोई सार्वजनिक स्थल नहीं था बल्कि एक विश्वविद्यालय का परिसर था क्या यह नारे जातिगत भेदभाव को नहीं दर्शाते, यदि नहीं तो यूजीसी क्या सवर्ण से जो भेदभाव होता है उसकी शिकायता  कहॉ दर्ज होगी, इसके लिए ईओसी (शिकायत केन्द्र) में कोई व्यवस्था नही है।
    स्मरण हो कि कांग्रेस सरकार में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए एक कानून लाया गया जिसमें कहा गया कि पुरुष यदि किसी युवती/महिला को घूरेगा तो उस पर आईपीसी की धारा में महिला शिकायत दर्ज करा सकती है। वह पुरूष आरोपी माना जाएगा और उस पर मा0 न्यायालय में मुकदमा चलेगा बसपा सरकार में एससी-एसटी एक्ट आया तो ऐसा लग रहा था अब तो सवर्ण जाति का जीना मुश्किल हो जाएगा और लोग यह मानने लगे थे कि इस कानून के आने पर बेगुनाह लोग जेल जाएंगे।
इस दुनिया में ईश्वर का फैसला भी आता है, यह विश्वास आस्तिक समाज का है, वह मानते है ईश्वर का नियम रहा  कि वह धर्म की रक्षा करे और अधर्म का विनाश।  वर्तमान परिस्थितियिं में भी अनुभव मिल रहा है कि आज देश की युवा छात्र-छात्राओं की सोच संकुचित नहीं है, वह कर्म के साथ ईश्वर पर भी विश्वास करता है। नए भारत को आगे ले जाना चाह रहा। उन्हें जातिगत भेदभाव नहीं आता और ना ही उनमें यह भावनाएं रही हैं। यह मानना होगा कि जातिगत भेदभाव की भावनाएं यदि उनमें होती तो न जाने इस कारण से उच्च शिक्षा संस्थानों में कितने झगड़े और हत्याएं जैसी घटनाएं हो रही होती परंतु ऐसा अभी तक देखने को नहीं मिला। वर्तमान के समय में सोशल मीडिया में यह सब दिखाई भी नहीं पड़ रहा फिर क्या यूजीसी कानून सिर्फ राजनीतिक प्रोपेगैडा  के लिए बना है? 
स्पष्ट है यूजीसी कानून राजनीतिक प्रोपेगैडा फैलाने के लिए ही है, क्योंकि देश को यह कौन बतायेगा, जब सवर्ण से कोई भेदभाव करेगा तब क्या होगा, क्योंकि गरीब सवर्ण को अच्छे नंबरों के प्राप्त होने के बावजूद उसे शिक्षण संस्थानों में एडमिशन व सरकारी नौकरी सिर्फ इसलिए नहीं मिल रही है क्योकि आरक्षण के कारण व मेरिट से बाहर रह जाते है। यह कौन बतायेगा कि जब सवर्ण प्रताड़ित किया जाएगा तो वह किस आयोग के पास न्याय मांगने जाएगा? आखिर इन प्रश्नों को जवाब देने के लिए कोई न कोई राजनीतिक दल सामने आए। वैसे यह सामने नहीं आयेंगे क्योंकि देश में सवर्ण वोट बैंक सबसे कम है।
वर्तमान समय की परिस्थितियां यही बताती है कि आरक्षण, एससी-एसटी ओबीसी एक्ट, अल्पसंख्यक कानून बनाने से जातिगत भेदभाव को नही मिटा पाया है। तो क्या यूजीसी का कानून लागू होने से जातिगत भेदभाव समाप्त हो जायेंगे? वैसे हमारे देश का इतिहास गवाह है कि समाज में सामजिक समानता, बौद्धिक तर्क शक्ति से, सामाजिक समरसता के व्यवहार रखने से आती है। राष्ट्र भावना के प्रति निज स्वार्थ को त्याग कर समानता लाने का विचार करने वाले लोग ही समाज में समानता और जातिगत भेदभव को मिटा सकते हैं। यह वह विचार हैं जो डॉ0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी , पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेई के जीवन से सीखे जा सकते हैं और जिनको सर्व समाज समझ सके। इनकी स्मृति में राष्ट्र प्रेरणा स्थल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बनाया गया और 26 जनवरी 2026 के दिन जब मैं यहां गया तो देखा सभी समुदाय, जाति के लोग इसे देखने आए थे। यह भीड़ आरक्षण, एससी-एसटी एक्ट, ओबीसी एक्ट, महिलाओं को घूरने, और यूजीसी कानून को राजनीति प्रोपेगैंडा को स्पष्ट कर रहे थे।