कुटुम्ब का साथ नहीं मिलता तो ‘संघ’ खड़ा नहीं होताः डॉ. मोहन भागवत
गोरखपुर विभाग द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में कुटुम्ब स्नेह मिलन का आयोजन किया गया।। स्नेह मिलन में गोरखपुर महानगर के 20 नगरों, चौरी-चौरा, गोरखपुर ग्रामीण के जिला स्तरीय कार्यकर्ता, नगर- जिला- विभाग- प्रांत कार्यकारिणी, प्रवासी कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य सम्मिलित हुए।
कुटुम्ब स्नेह मिलन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि आज हम सब कुटुम्ब स्नेह मिलन कार्यक्रम में आए हैं। एक छत, एक चारदीवारी में एक पुरुष-महिला से कुटुम्ब नहीं बनता। कुटुम्ब में एक रिश्ता होता है, जिसमें अपनापन होता है। शिशु का जन्म के कुछ क्षण बाद अपनेपन से धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों से रिश्ता बन जाता है। अगली पीढ़ी सामाजिक बने, इसके लिए कुटुम्ब एक इकाई है। समाज में कैसे रहना है, इसका प्रशिक्षण परिवार में होता है। भारत में अपनेपन से बना कुटुम्ब केवल भारत में ही है, अन्य देशों में यह सौदा होता है। भारत में विशेषता है दृ अपनेपन से बना सम्बन्ध। विदेशों में सम्बन्ध ऐसा नहीं है, वह सौदे का सम्बंध है। हमारे यहाँ बच्चे को अपना कुटुम्ब मिलता है, जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। वहां बड़े होने पर कुटुम्ब से मुक्त हो जाते हैं। समाज कुटुम्ब के कारण चलता है। पेट भरने का कारण भी कुटुम्ब ही है, व्यवसाय का आधार परिवार होता है। उत्पादन, पैसे की बचत, राष्ट्र की संपत्ति सब परिवार में है। परिवार में राष्ट्र का धन भी संचित है। लाल बहादुर शास्त्री जी का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने लोगों से आवाह्न किया था कि वो अपना सोना-चांदी आदि राष्ट्र को दें तो लोगों ने राष्ट्र के लिए दे दिया।
सरसंघचालक जी ने कहा कि मैं अकेला नहीं हूं, बल्कि हम सब हैं, अतः केवल अपनी आवश्यकताओं का विचार नहीं करूंगा, यह कुटुम्ब में सिखाया जाता है। सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों का केंद्र, संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरण का केंद्र कुटुम्ब ही है। कुटुम्ब का केंद्र माता है। पीढ़ी को तैयार करने वाली महिला होती है। इसी से भारत माता का परिचय होता है, हम भारत माता के पुत्र हैं। हमारे देश में महिलाओं को माता की दृष्टि से देखते हैं, सिवाय उसके जिससे विवाह हुआ है। विदेशों में ऐसा नहीं है। हमारी दृष्टि केवल वैचारिक नहीं है, यह आचार में आए यह हमारी परम्परा है, जो परिवार से आता है। हमारे यहाँ व्यक्ति से बड़ा परिवार है, विदेशों में व्यक्ति परिवार से बड़ा है। हम विवाह को ‘कर्तव्य’ मानते हैं ‘करार’ नहीं। घर में संस्कार नहीं होंगे तो मतान्तरण होगा।
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