सिनेमा और समाज का बदलता दौऱ
-यशवर्धन दीक्षित
सिनेमा का अर्थ है तस्वीरो के जरिए अपने मन के विचारो को चित्रों के जरिए लोगो के सामने अपनी बात रखना। सिनेमा की शुंरूआत 1895 फ्रांस से हुई थी और फिल्म को डायेरेक्ट करने वाले लूमियर ब्रदर्स थे। एक का नामे आगस्ट लूमियर और लूई लूमियर था। पहली पिक्चर इन्ही के द्वारा बनाई गई , जिसका नाम‘‘वर्कर्स लीविंग द फैक्ट्री’’ था। यह मूवी ब्लैक एंड व्हाइट कलर में सिर्फ 46 सेकेंड की थी।
भारत में सिनेमा जगत की बात करे तो पहले मूवी भी समाज के दर्पण के रूप में आयी थी। भारत के पहले डायेरेक्टर और प्रोड्यसर सत्येजीत रे थें। इनकी मुलाकात एक फ्रांसीसी निर्देशक जीन रेनुआर से हूई जो एक फिल्म ‘‘द रीवर ’’ की शूटिंग के लिए भारत आये हुए थे। जिनसे मिलकर सत्यजीत रे को यह आभास हुआ कि भारत की संस्कृति को भी सिनेमा के जरिए लोगो तक पहुंंचारया जा सकता है। यह समझते हुए, उन्होने ‘‘राजा हरीशचन्द्र ’’ के जीवन पर उन्ही के नाम पर फिल्म बनाई और लोगो तक सिनेमा के माध्यम से मूवी के जरिए संदेश दिया, जो सबको सत्यवादी और ईमानदार बनने की प्रेरणा देती है।
कहते है कि समय के साथ-साथ समाज का व्यवहार भी बदला जिसमे कारण इसी सिनेमा की दुनिया में भारतीय संस्कृति के साथ -साथ, घर-परिवार की कहानियां लिखी गयी और उन पर भी फिल्म बनाई गई। भारत मे पहली बोलने वाली फिल्म आलम आरा (1931) में बनाई गई थी। इसके बाद भारत में सिनेमे को एक नया रूप दे ने क े लिए स्वर्णकाल (1950-1969़) का समय रहा और इस जमाने में फिल्म ‘‘आवारा (1951) ,दो बीघा जमीन(1953), पत्थर पंचाली (1955) , मदर इंडिया(1957़) गेगा जमुना (1961़), आदि फिल्मों में ग्रामीण और शहरी भाग दौड़ जैसे जीवन को दर्शाया जाता था। 1970-1980 क्रे दौर को देखा जाए तो सिनेमा में परिवार और सामाजिक संघर्ष पर फिल्मे बनने लगी, जैसे उपकार(1967), ‘‘अमर अकबर एंथनी (1977़)’’, सत्यम शिवम सुंदरम (1978) जैसी जो िॅफल्मे बनी उसमें हल्का-हल्का भारतीय और पश्चिमी संस्कृति का मिला-जुला प्रभाव देखा गया। सिनेमा की प्रसिद्ध जैसे-जैसे बढ़ती गयी, फिल्म निर्देशको ने समय साथ ही एनआरआई संस्कृति और शादी परिवार पर फिल्म बनाने लगे, जैसे ‘‘हम आपके है कोन’’ (1994़), हम साथ-साथ है(1999), कुछ-कुछ होता है (1998), आदि प्रकार की फिल्मो ने सिनेमा जगत में धूम मचा दी और सन् 2000 से सन् 2010 के बीच की जो फिल्में बनी उनमें आधुनिकता और प्रेम प्रदर्शन के साथ परंपरा , रीति-रिवाजों को लेकर फिल्म बनी, जैसे ‘‘कभी खुशी,कभी गम, बागबान और विवाह। बदलते जमाने के साथ भारतीय संस्कृति के साथ वेस्टर्न संस्कृति को भी बढ़ावा मिलने लग। इस बदलते वक्त में जो भी मूवी बनी थी उनमें वो दृृश्य नही दिखते जो परिवार को जोड़ कर रखता है। यह ऐसी फिल्में होती थी जिन्हें एक साथ परिवार के सभी लोग सिनेमाघरों में देखने के लिए जाते थे। क्योंकि यह फिल्में परिवार को जोड़े रखने का संदेश देती थी बल्कि अब जो फिल्में बन रही है वह फिल्म सिर्फ धन और नाम के लिए होती है।
सिनेमा घर से दिखायी जाने वाली फिल्में ही थी जो हमारी संस्कृति को बढ़ाती थी अब वही सिनेमा घर से दिखायी जाने वाली फिल्म हमारी संस्कृति को भी नष्ट करने जैसी है। दुष्प्रभाव यह है कि फिल्मों से प्रभावित हमारी यूवा पीढ़ी अपनी भारतीय संस्कृति पर सवाल उठाने लगी। विवाह परंपरा जो भारत में एक संस्कार पद्धति है उसमें अब फैशन और दिखावा अधिक है। संस्कार जैसे कार्यक्रम का महत्व कम दिया जा रहा है। जिससे युवा समाज वास्तुविक दुनिया छोड़ कर अब वो काल्पनिक दुनिया में जीने लगा और फिर यही से युवाओ का मानसिक विकास पर हानि हुई बल्कि भारत की संस्कृति पर भी एक संकट की तरह प्रकट हो गयां। यह एक चिंतन का विषय है, कि हम इसका हल नही निकाल पा रहे। जबकि हमेंं अपने बच्चो को भारतीय संस्कार से अवगत कराते रहना चाहिए और उन्हें हमेशा वास्तिविक्ता में जीने की दिशा देनी चाहिए। पंरतु बहुत सी ऐसी मूवी और सीरयल है जो हमारी संस्कृति और पंरपरा को दर्शाते है उन्हें देखना चाहिए। हमे अपने विवेक और शांत मन के जरिए इन पर विचार करना चाहिए। आज जिस प्रकार से सिनेमा के जरिए यह अशिलीलता दिखाई जा रही उसे अगर हमने रेकने का प्रयास नही किए तो समाज का पतन का कारण यह सिनेमा होंगे।
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