आम जनता से भी विचार विमर्श कर फैसले लेने होंगे
सतीश कुमार दीक्षित
राजनीतिक दलों में जनता की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान करने का उद्देश्य का वादा जब जनता से सत्ता सुख की पूर्ति के लिए होगा, तब-तब राष्ट्र सुख की कामना दिन मे सपने देखने जैसे होती है। राष्ट्र सुख की चिंता करनी है तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति आर्थिक, सामाजिक व्यवस्थाओ एवं परंपराओं पर आम जनता से भी विचार-विर्मश कर, ऐसे फैसले करने होंगे जिसमें सामाजिक समरसता बढ़ाने की दृष्टि एक दम स्पष्ट दिखायी देनी चाहिए, यूजीसी एक्ट में ऐसा न करना विश्विद्यालयों के छात्र-छात्राओं में ही नहीं बल्कि जातियों में भी आक्रोश पैदा हुआ हैं जिसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकते हैं.
देश में सामाजिक समरस्ता की नीव मजबूत करनी है. परंन्तु ऐसे कार्य किसी सरकार द्वारा नही किए जा सकते जिसमें राजनीतिक तुष्टिकरण की भावनायें होंगी, इसके लिए समाज के लोग जिम्मेदार है कि वह सामाजिक समरसता एवं सदभाव की भावनाएं स्वयं में जगाएं क्योंकि आपसी प्रेम व्यवहार में इतनी शक्ति होती है जिसके माध्यम से ही समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक परिस्थित में सुधार लाया जा सकता है। यह सही है कि वर्तमान मे लोकतांत्रिक तरीके से ऐसे प्रयास किए जा रहे है, परंतु इसमे सफलता मिलनी संभव नही है। लोकतंत्र में तो पक्ष -विपक्ष में सदैव विरोधाभास की स्थितिबनी रहती । इन परिस्थितियों में समाज के लोग भी कई पक्षों मे बट जाते है और देखा जाये तो समाज का कुछ हिस्सा पूरी तरह विभाजित हो भी चुका है। जिसे संगठित करने का काम कोई भी रजनीतिक दल नही कर रहा और न ही उसमें संगठित करने की इच्छा हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकाल में समय-समय पर कुछ फैसले ऐसे हुए जिसके परिणाम स्वरूप समाज मे कटुता बढ़ती हुई दिखाई पड़ी है।
आज शिक्षा के क्षेत्र में जितनी अधिक बढ़ोत्तरी हुई है उससे कही अधिक युवाओ में सरकार के प्रति आक्रोश भी दिखाई पड़ता है। इन सबका कारण हमारी युवा पीढ़ी को नागरिक कर्तब्यो से दूर रखा जाना। पहले भी और वर्तमान के राजनीतिक दलो द्वारा उन्हें कर्तब्य से अधिक अधिकारों के प्रति जगरूक करते हुए सामाजिक विभाजन करने का मार्गदर्शन दिया जा रहा जिससे वे अपने कर्तब्यों से वंचित हुए. इस प्रकार की भी साजिश निरन्तर रची गई कि जिससे युवा पीढ़ी बिना स्क्लि के बेराजगारी की दशा में रहने के कारण ही वह अवसाद की स्थिति में पहुंच जाती है।
युवाओ को नौकरी व रोजगार की उम्मीद वर्तमान सरकार से होती है न कि अपने समाज से। समाज को भी यह सत्य स्वीकारना चाहिए कि जब तक सरकारी व्यवस्था में जाति व आरक्षण के आधार पर एक विशेष वर्ग को बढ़ावा देने कि बात की जाती रहेगी तब तक विश्वविद्यालयो में युवा शक्ति के बीच टकराव भी देखने को मिलेगा। अभी पूर्व के दिनों में पत्रकार रूचि तिवारी पर हमला उसकी जाति के कारण हुआ यह स्वयं रूचि तिवारी कहती है। मेरे अनुभव के आधार पर यह कोई नया प्रकरण भी नही है इससे पूर्व भी कई ऐसे प्रकरण सामने आए है जो जाति के कारण घटित हुए।
सम्पूर्ण जाति के लोग हमारे भारत के परिवार के लोग है, फिर भी उसमे नौकरी व रोजगार के लिए किसी विशेष जाति की योग्यता को दबा कर कै़से रखा जा सकता है। अच्छे अंक पाने वाले छात्रों के दिमाग़ में यह प्रश्न गूंजने लगे हैं कि अयोग्य व्यक्ति की क्षमता को किसी योग्य व्यक्ति की क्षमता से श्रेष्ठ कैसे माना जा सकता है? जाति और आरक्षण जैसी सुविधाएं कितनी उचित है, यह प्रश्न नई युवा पीढ़ी के लिए हैरान करने वाला है।
हमें अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों से जाति और आरक्षण जैसे मुद्दे को समझने का प्रयास करना होगा कि जब हम अपने घर के निर्माण में यह तय करते है कि कौन सा राजगीर, कारपेंटर अच्छा है, जिससे कार्य कराया जाए, ऐसा विचार-विमर्श करके ही राजगीर व कारपेंटर का चयन करके उसे काम पर रख लेते है ऐसे समय में उसकी जाति कोई नही देखता है और न ही राजगीर और कारपेण्टर का चयन करते समय हम सब यह देखते है कि उसे कोई काम नही दे रहा है तो चलो उसे हमें ही काम दे देना चाहिए। सबका मानना यही होता है कि यदि उसे अच्छा काम आ रहा होता तो बेरोजगार ही क्यों रहता.
समाज को यह चिंता तो अवश्य करनी होगी कि अयोग्य बेरोजगार युवा पीढ़ी को भी योग्य अर्थात स्किल युक्त बनाकर उन्हें नौकरी व रोजगार दिलाने में सहायक बनाया जा सकता है ताकि वे भी अपने कार्य को अच्छी तरह से कर सकें। क्योंकि सरकारें तो सत्ता सुख के लिए बनायीं जा रही हैं अन्यथा जाति और आरक्षण जैसे मुद्दे से हट कर सरकार की नीतियो में ऐसे भाव भी समाहित होने चाहिए थे ताकि युवा पीढ़ी के अंदर का उत्साह जागृृति हो सके। निश्चय ही सरकारी नीतियों की ऐसी भावनाएं हमारे समाज में परिवर्तन लाने के लिए सहायक साबित होंगी। यह कार्य आसान भी नही परंतु असम्भव भी नही है क्योंकि हमारे समाज में परिवर्तन जब भी हुआ है या भविष्य में होगा, वह धीरे-धीरे ही होता है।
admin